इस्तिखारा की नमाज़ किसी फैसले में अल्लाह से अपने लिए बेहतर रास्ता माँगने का तरीका है। इसमें दो रकअत नफ़्ल नमाज़ पढ़कर नबी मुहम्मद ﷺ की सिखाई हुई दुआ की जाती है। फैसला करने से पहले ख्वाब देखना ज़रूरी नहीं।
इस्तिखारा का मतलब
इस्तिखारा का मतलब है अल्लाह से अपने लिए भलाई का चुनाव माँगना। यह ऐसे जायज़ मामले के लिए है जिसमें आपके सामने सचमुच विकल्प हों—जैसे नौकरी, दूसरी जगह बसने या शादी के प्रस्ताव पर विचार करना। यह किसी फ़र्ज़ की जगह नहीं लेता और न ही किसी मना किए गए काम को जायज़ बनाता है।
नबी ﷺ के साथी जाबिर इब्न अब्दुल्लाह ने बताया कि आप ﷺ अपने साथियों को उनके मामलों में इस्तिखारा सिखाते थे। आपने फ़र्ज़ नमाज़ से अलग दो रकअत पढ़ने, फिर उस मामले की भलाई माँगने और उसके नुकसान से पनाह चाहने की दुआ सिखाई (Sahih al-Bukhari 6382)।
इस्तिखारा की नमाज़ कैसे पढ़ें
रकअत नमाज़ की एक इकाई है। बुनियादी तरीका यह है:
- तय करें कि आप किस फैसले के लिए इस्तिखारा कर रहे हैं।
- फ़र्ज़ नमाज़ से अलग दो रकअत नफ़्ल पढ़ें।
- नमाज़ के बाद इस्तिखारा की दुआ पढ़ें। जहाँ “इस मामले” के शब्द आएँ, अपने फैसले को ज़ेहन में रखें या उसका नाम लें।
- उपलब्ध जानकारी पर गौर करें, ज़रूरत हो तो भरोसेमंद लोगों से सलाह लें और फिर उचित अगला कदम उठाएँ।
जाबिर की रिवायत में दो रकअत के बाद दुआ सिखाई गई है। इस नमाज़ के लिए क़ुरआन की कोई ख़ास सूरह पढ़ना ज़रूरी नहीं। अगर आप अब भी विकल्पों पर विचार कर रहे हैं, तो दोबारा इस्तिखारा कर सकते हैं; इसे किसी तय संख्या में दोहराना ज़रूरी न समझें।
इस्तिखारा की दुआ
दुआ का मतलब है अल्लाह से माँगना—अपने शब्दों में या क़ुरआन और सुन्नत में सिखाए गए शब्दों से। सुन्नत नबी ﷺ की शिक्षा और तरीक़े को कहते हैं। नीचे जाबिर की रिवायत में आई दुआ का उच्चारण रोमन अक्षरों में दिया गया है (Sahih al-Bukhari 6382)। अरबी शब्दों को रोमन अक्षरों में लिखने के तरीके अलग हो सकते हैं।
الدعاء بالعربية — صحيح البخاري ١١٦٦
اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْتَخِيرُكَ بِعِلْمِكَ، وَأَسْتَقْدِرُكَ بِقُدْرَتِكَ، وَأَسْأَلُكَ مِنْ فَضْلِكَ الْعَظِيمِ، فَإِنَّكَ تَقْدِرُ وَلَا أَقْدِرُ، وَتَعْلَمُ وَلَا أَعْلَمُ، وَأَنْتَ عَلَّامُ الْغُيُوبِ.
اللَّهُمَّ إِنْ كُنْتَ تَعْلَمُ أَنَّ هَذَا الْأَمْرَ خَيْرٌ لِي فِي دِينِي وَمَعَاشِي وَعَاقِبَةِ أَمْرِي — أَوْ قَالَ: عَاجِلِ أَمْرِي وَآجِلِهِ — فَاقْدُرْهُ لِي، وَيَسِّرْهُ لِي، ثُمَّ بَارِكْ لِي فِيهِ.
وَإِنْ كُنْتَ تَعْلَمُ أَنَّ هَذَا الْأَمْرَ شَرٌّ لِي فِي دِينِي وَمَعَاشِي وَعَاقِبَةِ أَمْرِي — أَوْ قَالَ: فِي عَاجِلِ أَمْرِي وَآجِلِهِ — فَاصْرِفْهُ عَنِّي، وَاصْرِفْنِي عَنْهُ، وَاقْدُرْ لِي الْخَيْرَ حَيْثُ كَانَ، ثُمَّ أَرْضِنِي بِهِ.
Allahumma inni astakhiruka bi ‘ilmika, wa astaqdiruka bi qudratika, wa as’aluka min fadlika al-‘azim. Fa innaka taqdiru wa la aqdir, wa ta‘lamu wa la a‘lam, wa anta ‘allamu al-ghuyub.
Allahumma in kunta ta‘lamu anna hadha al-amra khayrun li fi dini wa ma‘ashi wa ‘aqibati amri — aw qala: ‘ajili amri wa ajilihi — faqdurhu li, wa yassirhu li, thumma barik li fihi.
Wa in kunta ta‘lamu anna hadha al-amra sharrun li fi dini wa ma‘ashi wa ‘aqibati amri — aw qala: fi ‘ajili amri wa ajilihi — fasrifhu ‘anni, wasrifni ‘anhu, waqdur li al-khayra haythu kana, thumma ardini bihi.
Hadha al-amra का मतलब है “यह मामला”। उस जगह अपना फैसला ज़ेहन में रखें या उसका नाम लें। “या: उसके मौजूदा और आगे के नतीजे” वाले शब्द हदीस में दर्ज अलग शब्दांकन को दिखाते हैं; दोनों विकल्प कहना ज़रूरी नहीं।
हिंदी अर्थ:
ऐ अल्लाह, मैं तेरे इल्म के ज़रिए अपने लिए बेहतर चुनाव माँगता हूँ। तेरी क़ुदरत के ज़रिए सामर्थ्य माँगता हूँ और तेरे बड़े फ़ज़्ल में से माँगता हूँ। तू क़ुदरत रखता है, मैं नहीं; तू जानता है, मैं नहीं; और तू अनदेखी बातों को जानता है।
ऐ अल्लाह, अगर तू जानता है कि यह मामला मेरे दीन, मेरी रोज़ी और मेरे मामलों के अंजाम के लिए अच्छा है—या मेरे अभी और आगे के लिए अच्छा है—तो इसे मेरे लिए तय कर दे, आसान कर दे और इसमें बरकत दे।
और अगर तू जानता है कि यह मामला मेरे दीन, मेरी रोज़ी और मेरे मामलों के अंजाम के लिए बुरा है—या मेरे अभी और आगे के लिए बुरा है—तो इसे मुझसे दूर कर दे और मुझे इससे दूर कर दे। जहाँ भी भलाई हो, उसे मेरे लिए तय कर दे और फिर मुझे उससे राज़ी कर दे।
अगर अभी अरबी दुआ नहीं पढ़ पाते, तो उसे धीरे-धीरे सीखें। आप अपने समझ में आने वाले शब्दों में भी अल्लाह से हिदायत माँग सकते हैं। अपनी परिस्थिति में नमाज़ के तरीके पर सलाह के लिए किसी भरोसेमंद स्थानीय इमाम या आलिम से पूछें।
इसके बाद क्या उम्मीद रखें
इस्तिखारा भविष्य बताने का तरीका नहीं है। इसमें आप अपने चुनाव और उसके नतीजे के लिए अल्लाह से हिदायत माँगते हैं; छिपी हुई बातें जानना या कोई पक्का संकेत पाना इसका मकसद नहीं।
ख्वाब देखना ज़रूरी नहीं। अचानक पूरा यक़ीन महसूस होने का इंतज़ार भी ज़रूरी नहीं। जानकारी जुटाएँ, विकल्प पर सोचें, सलाह लें और अपनी समझ के मुताबिक आगे बढ़ें। कोई मौका मिलना या हाथ से निकलना फैसले पर असर डाल सकता है, लेकिन हर घटना को ऐसा संदेश न मानें जिसका मतलब निकालना ही पड़े।
शादी के प्रस्ताव पर विचार कर रहे हों, तो स्वभाव और आपसी मेल के बारे में उचित सवाल पूछें। नौकरी के बारे में सोच रहे हों, तो काम और उसकी शर्तें समझें। दुआ के साथ फैसले में सामान्य सावधानी भी बरतें।
दो रकअत पढ़ने के वक़्त में किन बातों का ध्यान रखें?
कुछ वक़्तों में नफ़्ल नमाज़ पढ़ने पर सुन्नी मसलकों के बीच मतभेद है। इनमें फ़ज्र के बाद से सूरज निकलने तक, ज़ुहर से पहले जब सूरज अपने सबसे ऊँचे बिंदु के आसपास हो, और अस्र के बाद से सूरज डूबने तक का वक़्त शामिल है। किसी ख़ास वजह से पढ़ी जाने वाली नमाज़, जिसमें इस्तिखारा भी शामिल है, के अपवादों पर भी विद्वानों की राय अलग है।
जहाँ संभव हो, मतभेद से बचने के लिए इन वक़्तों के बाहर नमाज़ पढ़ें। अपने इलाके के नमाज़ के वक़्त देखें; सूरज निकलने और डूबने के आसपास ख़ास ध्यान दें। अगर फैसला तुरंत करना हो या फिलहाल नमाज़ न पढ़ सकें, तब भी दुआ करके हिदायत माँग सकते हैं। अपनी स्थिति में नमाज़ के बारे में किसी भरोसेमंद स्थानीय आलिम से पूछें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या इस्तिखारा के बाद ख्वाब आना ज़रूरी है?
नहीं। जाबिर की रिवायत नमाज़ और दुआ सिखाती है; फैसला करने के लिए ख्वाब को शर्त नहीं बनाती (Sahih al-Bukhari 1166)। उपलब्ध जानकारी और सलाह के आधार पर अपनी पूरी समझ से फैसला करें।
क्या मैं किसी दूसरे के फैसले के लिए इस्तिखारा कर सकता हूँ?
आप अल्लाह से उस व्यक्ति के लिए हिदायत और मदद माँग सकते हैं। जिसके सामने फैसला है, वह खुद भी इस्तिखारा और सलाह ले सकता है। साझा फैसले को लेकर उलझन हो, तो किसी भरोसेमंद इमाम से बात करें।
क्या दुआ फ़ोन पर देखकर पढ़ सकते हैं?
हाँ, सीखते समय दुआ देखकर पढ़ सकते हैं। नमाज़ के अंदर पढ़ी जाने वाली चीज़ों और दुआ के बारे में मसलकों की प्रथाएँ अलग हो सकती हैं; ऊपर बताए तरीके में दुआ दो रकअत के बाद है। अपनी नमाज़ से जुड़ा व्यावहारिक सवाल हो, तो स्थानीय इमाम से पूछें।
अगर दोनों विकल्प अच्छे लगें तो क्या करूँ?
इस्तिखारा हमेशा अनिश्चितता दूर नहीं करता। विकल्पों की तुलना करें, मामले को समझने वाले व्यक्ति से सलाह लें और ज़िम्मेदारी से चुनाव करें। किसी संकेत का अनिश्चित समय तक इंतज़ार किए बिना फिर से हिदायत माँग सकते हैं।
क्या दुआ के लिए क़िबले की ओर मुँह करना ज़रूरी है?
दो रकअत नमाज़ के लिए क़िबले की ओर मुँह करें। क़िबला मक्का में काबा की दिशा है। नमाज़ के बाद दुआ के लिए किसी ख़ास दिशा को शर्त न समझें। नमाज़ की दिशा जाँचनी हो, तो क़िबला कम्पास इस्तेमाल करें।